[{"data":1,"prerenderedAt":383},["ShallowReactive",2],{"sloka-hi-hanuman-hanuman-chalisa":3},{"id":4,"title":5,"body":6,"date":353,"description":354,"excerpt":355,"extension":369,"lang":370,"lord":371,"lord_id":372,"meta":373,"navigation":374,"path":375,"seo":376,"sloka_id":377,"stem":378,"tags":379,"__hash__":382},"slokas\u002Fslokas\u002Fhi\u002Fhanuman\u002Fhanuman-chalisa.md","हनुमान चालीसा",{"type":7,"value":8,"toc":349},"minimark",[9,13,21,23,29,31,37,39,45,47,53,55,61,63,69,71,77,79,85,87,93,95,101,103,109,111,117,119,125,127,133,135,141,143,149,151,157,159,165,167,173,175,181,183,189,191,197,199,205,207,213,215,221,223,229,231,237,239,245,247,253,255,261,263,269,271,277,279,285,287,293,295,301,303,309,311,317,319,325,327,333,335,341,343],[10,11,5],"h1",{"id":12},"हनुमान-चालीसा",[14,15,16,17,20],"p",{},"श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि",[18,19],"br",{},"\nबरनौं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥",[18,22],{},[14,24,25,26,28],{},"बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार",[18,27],{},"\nबल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ॥",[18,30],{},[14,32,33,34,36],{},"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर",[18,35],{},"\nजय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥ 1 ॥",[18,38],{},[14,40,41,42,44],{},"राम दूत अतुलित बल धामा",[18,43],{},"\nअंजनि पुत्र पवन सुत नामा ॥ 2 ॥",[18,46],{},[14,48,49,50,52],{},"महाबीर बिक्रम बजरंगी",[18,51],{},"\nकुमति निवार सुमति के संगी ॥ 3 ॥",[18,54],{},[14,56,57,58,60],{},"कंचन बरन बिराज सुबेसा",[18,59],{},"\nकानन कुंडल कुंचित केसा ॥ 4 ॥",[18,62],{},[14,64,65,66,68],{},"हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै",[18,67],{},"\nकाँधे मूँज जनेऊ साजै ॥ 5 ॥",[18,70],{},[14,72,73,74,76],{},"शंकर सुवन केसरी नंदन",[18,75],{},"\nतेज प्रताप महा जग वंदन ॥ 6 ॥",[18,78],{},[14,80,81,82,84],{},"विद्यावान गुनी अति चातुर",[18,83],{},"\nराम काज करिबे को आतुर ॥ 7 ॥",[18,86],{},[14,88,89,90,92],{},"प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया",[18,91],{},"\nराम लखन सीता मन बसिया ॥ 8 ॥",[18,94],{},[14,96,97,98,100],{},"सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा",[18,99],{},"\nविकट रूप धरि लंक जरावा ॥ 9 ॥",[18,102],{},[14,104,105,106,108],{},"भीम रूप धरि असुर संहारे",[18,107],{},"\nरामचंद्र के काज संवारे ॥ 10 ॥",[18,110],{},[14,112,113,114,116],{},"लाय संजीवन लखन जियाये",[18,115],{},"\nश्री रघुवीर हरषि उर लाये ॥ 11 ॥",[18,118],{},[14,120,121,122,124],{},"रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई",[18,123],{},"\nतुम मम प्रिय भरत सम भाई ॥ 12 ॥",[18,126],{},[14,128,129,130,132],{},"सहस बदन तुम्हरो यश गावैं",[18,131],{},"\nअस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥ 13 ॥",[18,134],{},[14,136,137,138,140],{},"सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा",[18,139],{},"\nनारद सारद सहित अहीसा ॥ 14 ॥",[18,142],{},[14,144,145,146,148],{},"यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते",[18,147],{},"\nकवि कोविद कहि सके कहाँ ते ॥ 15 ॥",[18,150],{},[14,152,153,154,156],{},"तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा",[18,155],{},"\nराम मिलाये राज पद दीन्हा ॥ 16 ॥",[18,158],{},[14,160,161,162,164],{},"तुम्हरो मंत्र विभीषण माना",[18,163],{},"\nलंकेश्वर भए सब जग जाना ॥ 17 ॥",[18,166],{},[14,168,169,170,172],{},"युग सहस्र योजन पर भानू",[18,171],{},"\nलिल्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ 18 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