सूर्य श्लोक

आदित्य हृदयम्

ततो युद्ध परिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ 1 ॥


दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्
उपागम्याब्रवीद्रामं अगस्त्यो भगवान् ऋषिः ॥ 2 ॥

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